मंज़िल

चलते-चलते शाम हो गई,
तूने कहा बस अब पहुंचने वाले हैं,
कुछ कदम और चल लो,
मंजिल अब करीब आई है,
फिर कुछ दूर चले ही थे 
कि कदम थकने लगे,
तुमने कहा बस आ गये,
चंद कदम और मंजिल के लिये,
राह के संघर्ष और थपेडों से
दुखने लगी मेरी काया है
मन को इधर संभालू तो 
साथ नहीं देती साया है
जी करता है तोड लूं नाता 
सारी दुनिया से फिर,
लगता है मुझ सा कमजर्फ कोई ना 
होगा इस दुनिया में,
जिंदगी के इतने रंग दिखाया जिंदगी ने
लगता है केवल मुझे ही चुना था
जिंदगी ने,
निराशा के भंवर में डूबती उतरती,
मंजिल के करीब न जाने कब पहुंचती,
अब रात होने को आई है,
फिर भी न दिखाई देती मंजिल है...
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