बहने और बढ़ने का नाम है जिंदगी...


कभी किसी का जीवन एक जैसा या स्थिर नहीं होता। जीवन में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं और जीवन में पैनापन इन्हीं उतार-चढ़ाव से आता है। उदाहरण के तौर पर तालाब के स्थिर जल में कोई नवीनता नहीं रहती। तालाब का जल पीलापन लिये और गहराई में गाद-मिट्टी जम जाती है। ठीक इसके विपरीत बहती हुई नदी का जल स्वच्छ और पारदर्शी  होता है। तीव्र वेग से बहती हुई नदी को पहाड़-पर्वतों और चट्टानों का सामना करना पड़ता है परंतु इसका वेग कभी कम नहीं होता। हमाारा जीवन भी नदी के समान है जिसमें कई तरह की मुश्किलें और परेशानियां आती हैं फिर भी हम उन्हें पार करके सदैव आगे की ओर बढ़ते जाते हैं। अंतिम समय में नदी जाकर समुद्र से मिल जाती है। जीवन का अंत भी विशाल परमात्मा के साथ अंगीकार करते हुए होता है। सही मायने में यही जीवन है और जीवन की सच्ची परिभाषा भी बहना और बढ़ना ही है...

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